आदिवासी नेता निशा भगत ने ‘दोहरे लाभ’ के विरोध में किया सार्वजनिक मुंडन, ईसाई आदिवासियों की ST सूची से डीलिस्टिंग की मांग
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रांचीः आदिवासी समाज की प्रख्यात नेत्री निशा भगत ने आज लोकभवन के पास एक विरोध प्रदर्शन करते हुए सार्वजनिक मुंडन किया। इस अनोखे विरोध का मकसद आदिवासियों को मिलने वाले सरकारी लाभों में कथित रूप से हो रहे “दोहरे लाभ” के खिलाफ आवाज उठाना था। निशा भगत ने प्रदर्शन में ईसाईधर्म स्वीकार करने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से डीलिस्ट करने की मांग की और साथ ही सरना संस्कृति की रक्षा और सरना कोड लागू करवाने की भी अपील की।

निशा भगत ने कहा कि कुछ लोग धर्मांतरण या शादी के जरिये आदिवासी समाज के नाम पर रहकर जाति व आवासीय प्रमाणपत्र बनवा लेते हैं और आदिवासी कल्याण के लिए आरक्षित योजनाओं का लाभ उठा लेते हैं। उन्होंने कहा, “यह हमारे अधिकारों का दुरुपयोग है। जिन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बदली है, उन्हें उस पहचान के आधार पर दिए जाने वाले विशेष लाभों पर पुनर्विचार होना चाहिए।”
(यह पक्ष विरोध का है; आरोपों की सत्यता की पुष्टि संबंधित अधिकारियों से करायी जानी चाहिए।)
विरोध में शामिल कार्यकर्ताओं ने कहा कि सरना संस्कृति—जो कई आदिवासी समुदायों की पारंपरिक आस्थाओं का केंद्र है—की रक्षा आवश्यक है। उन्होंने सरकार से सरना कोड को मान्यता देने और पारंपरिक धर्मों की सुरक्षा हेतु ठोस कदम उठाने की मांग की।
स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार प्रदर्शन शान्तिपूर्ण रहा और प्रदर्शनकारियों ने ज्ञापन भी सौंपा। प्रारम्भिक रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान कोई हिंसा या तोड़फोड़ की घटना नहीं हुई। प्रशासन ने मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है।
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इस मुद्दे पर समाज के विभिन्न वर्गों में मतभेद भी दिखे — कुछ नागरिकों ने निशा भगत की मांगों को सही ठहराया, तो कुछ ने कहा कि व्यक्तिगत धार्मिक चुनाव पर आपत्ति जताना संवेदनशील विषय है और इसे संवैधानिक ढांचे के भीतर ही हल करना चाहिए।
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आगे की कार्रवाई: सरकार से मांग की गयी है कि वे संबंधित प्रमाणपत्रों व रिकॉर्ड की जांच कर, नियमों के तहत उचित कार्रवाई सुनिश्चित करें और साथ ही सांस्कृतिक संरक्षण के लिए कदम उठाएं।
“हमारे पारंपरिक धर्म और अधिकारों का संरक्षण हमारा हक़ है — जो लोग व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहे हैं, उनकी पहचान और लाभों की समीक्षा होनी चाहिए,” — निशा भगत, आदिवासी नेत्री