राजगंज थाना प्रभारी अलीशा कुमारी का जाति प्रमाण पत्र रद्द – फर्जीवाड़े से हड़कंप

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धनबाद/गिरिडीह।

झारखंड में फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाने का एक और बड़ा मामला सामने आया है। जाति छानबीन समिति ने राजगंज थाना प्रभारी अलीशा कुमारी उर्फ अलीशा अग्रवाल का जाति प्रमाण पत्र रद्द कर दिया है। इस कार्रवाई के बाद न केवल संबंधित अधिकारियों में बल्कि पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है।

 

बोकारो निवासी प्रदीप कुमार रे की शिकायत पर जाति छानबीन समिति ने विस्तृत जांच की। जांच में पाया गया कि अलीशा कुमारी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों और वास्तविक तथ्यों में भारी विरोधाभास है।

 

जांच में सामने आए तथ्य

समिति ने गिरिडीह जिला के डुमरी थाना अंतर्गत जामताड़ा ग्राम स्थित अलीशा कुमारी के पते की भौतिक जांच की। वहां घर बंद मिला। पड़ोसियों से पूछताछ में पता चला कि उनके पिता भुवनेश्वर प्रसाद अग्रवाल करीब 30 वर्ष पहले रोजगार के लिए डुमरी आए थे और कोयले का कारोबार करते थे। उन्होंने एक मकान बनाकर किराए पर दे दिया और खुद बिहार के नवादा जिले में रहते हैं।

 

किस आधार पर मिला था जाति प्रमाण पत्र

अलीशा कुमारी ने झारसेवा पोर्टल पर रजिस्ट्री केवाला संख्या-1932 (22-10-1986), लगान रसीद 2015-16 और स्व-घोषित शपथ पत्र अपलोड कर जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था। ग्राम पंचायत जामताड़ा के मुखिया, वार्ड सदस्य और ग्रामीणों की उपस्थिति में आमसभा कर उन्होंने स्वयं को 1976 से झारखंड की स्थानीय निवासी बताया। इसी आधार पर तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी, डुमरी के लॉगिन आईडी से उनका जाति प्रमाण पत्र जारी हुआ था।

 

समिति के समक्ष हुई पेशी

लंबी जांच-पड़ताल के बाद 23 मई 2025 और 2 जुलाई 2025 को अलीशा कुमारी और शिकायतकर्ता प्रदीप कुमार रे अपने-अपने अधिवक्ताओं के साथ समिति के समक्ष उपस्थित हुए। अलीशा कुमारी झारखंड के पिछड़ा वर्ग संघ की सदस्यता साबित करने में नाकाम रहीं। उपलब्ध दस्तावेज़ों और तर्कों के आधार पर समिति के अध्यक्ष एवं सरकार के सचिव ने 16 मार्च 2017 को जारी जाति प्रमाण पत्र संख्या JHCC/2017/229784 को रद्द कर दिया।

 

अलीशा कुमारी का बयान

इस पूरे प्रकरण पर राजगंज थाना प्रभारी अलीशा कुमारी ने कहा—

“ऐसा कुछ नहीं है, मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। अगर आपके पास कोई ठोस सूचना या दस्तावेज़ हैं तो बताइए।”

महकमे में हड़कंप

इस कार्रवाई के बाद सरकारी महकमे में चर्चा तेज हो गई है। सवाल उठ रहा है कि आखिर इस तरह के प्रमाण पत्र वर्षों तक वैध कैसे रहे और सत्यापन में इतनी देरी क्यों हुई।

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