पूरी कहानी करोड़ो का इनामी नक्सली की : आठ जिस्म, एक रास्ता, एक अंजाम, ऑपरेशन का कोडनेम था, ‘शेर की वापसी’…

पूरी कहानी करोड़ो का इनामी नक्सली की : आठ जिस्म, एक रास्ता, एक अंजाम, ऑपरेशन का कोडनेम था, ‘शेर की वापसी’…

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ऑपरेशन का कोडनेम था – ‘शेर की वापसी’
एक घंटे की मुठभेड़, जिसने जंगल का इतिहास बदल दिया

लुगू पहाड़ की चट्टानों से टकराती गोलियों की आवाज ने पूरे जंगल की नींद उड़ा दी थी। और जब धुआं छंटा, तो धरती पर पड़े थे दो नाम विवेक और अरविंद यादव। दो जिस्म, एक रास्ता। दो कहानियां, एक अंजाम। विवेक कभी वह कोडरमा के कॉलेज में टॉपर था। आंखों में IAS बनने का सपना लिये, किताबों से दोस्ती करता था। पर जब पिता को जमींदारों ने पीटा, और बहन को सरकारी सिस्टम ने निगल लिया तो विवेक ने किताबें जला दीं और हाथ में उठा ली एके-47 “इंकलाब लाऊंगा” – कहता था वो। पर इंकलाब की जगह उसने चुन ली जंगलों की सत्ता, बंदूक की जुबान। सर्च ऑपरेशन में एक-एक कर कुल आठ नक्सलियों के डेड बॉडी मिली। जब मारे गये नक्सलियों की पहचान हुई तो झारखंड पुलिस खासकर CRPF के सुरक्षाबलों ने खूब वाहवाही बटोरी।

सालों तक झारखंड-बिहार सीमा पर उसके नाम से कांपती रही सरकार। और अब? एक करोड़ का इनामी… लुगू के पत्थरों में हमेशा के लिये खो गया। वहीं, एक गांव का सीधा-सादा लड़का था अरविंद। उसकी दुनिया थी, उसकी मां, उसकी प्रेमिका और उसका सपना – एक छोटा किराना दुकान। लेकिन जब गांव के दबंगों ने उसके प्यार को ‘जात’ की दीवार से कुचल डाला, तब अरविंद की आंखों में आंसू नहीं, आग थी। वो जंगल चला गया, जहां बंदूकें मिलती थीं, और बदला लेने की आजादी भी। 25 लाख का इनामी अरविंद मां की कोख से पैदा हुआ था इंसान बनकर, लेकिन मरा एक ‘वांटेड नक्सली’ बनकर। इन दोनों की कहानियां अलग थीं, लेकिन अंजाम एक जैसा…गोलियों की तड़तड़ाहट में मिट गई वो हस्तियां, जिन्हें कभी किताबों, खेतों और ख्वाबों से मतलब था। और अब? सिर्फ दो लाशें नहीं गिरीं – गिरे वो झूठे इरादे, वो अधूरी क्रांतियां, जो इंसानियत की जगह नफरत को पालती रहीं।

ऑपरेशन का कोडनेम था – ‘शेर की वापसी’
बोकारो पुलिस के पास खबर आई कि “दस्ता चला है सरगना विवेक का… भारी हथियारों के साथ… लुगू की ओर…”
तो सिर्फ वायरलेस नहीं कांपा, झारखंड पुलिस के बहादुर अफसरों की नसें भी सतर्क हो उठीं। करीब 200 जवान – जिनमें झारखंड पुलिस, CRPF और कोबरा यूनिट के शेर शामिल थे। अंधेरे में उतर पड़े थे। ना ढोल, ना नारे, बस नक्शे, निशाने और निगाहें साथ थीं। “इस बार कोई बचकर नहीं जायेगा…”यह शब्द थे SP की आंखों में तैरते हुये,
जो खुद टीम लीड कर रहे थे। जंगल इतना घना कि चांद भी झांकने से डरता। जंगल इतना खामोश कि पत्तियों की सरसराहट भी पूछती – “किस ओर जायेगी मौत?” और फिर…रात के डेढ़ बजे पहली गोली चली। नक्सलियों ने पहले फायर किया, एक झोंक में 10-15 गोलियां। लेकिन उन्हें क्या पता था, जवाब देने वाले सिर्फ सिपाही नहीं, जंग के जवान हैं।

एक घंटे की मुठभेड़, जिसने जंगल का इतिहास बदल दिया
चारों ओर से घेराबंदी, हर पेड़ के पीछे से गोलियों की बौछार और अंत में 8 नक्सली ढेर। जब सूरज निकला,
तो धरती पर खून की लकीरें थीं, बिखरे हुये हथियार थे, और खत्म हो चुके थे वो नाम जिनसे गांव कांपते थे। इधर, आज सुबह का उजाला जब लुगू की घाटी में फैला तो चिड़ियों की चहचहाहट की जगह बारूद की गंध और सन्नाटे की चीख थी। धरती पर आठ चेहरे पड़े थे…शरीर शांत, लेकिन चेहरों पर अब भी वही जुनून, वही ज़िद…जैसे आखिरी सांस तक कोई सपना जकड़ कर रखा हो। पुलिस की फाइल में इनके नाम माओवादी, वांटेड, अपराधी के तौर पर दर्ज है। मारे गये सभी आठों नक्सलियों के अलग-अलग कई किस्से हैं। एक साथ आठ नक्सलियों के मारे जाने के बाद से झारखंड पुलिस का इकबाल बुलंद

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