हेमंत सोरेन की भतीजी ने हेमंत की बढ़ाई मुसीबत!

हेमंत सोरेन की भतीजी ने हेमंत की बढ़ाई मुसीबत! पापा की सीट पर कर दी दावेदारी, लिया दादा – दादी का आशीर्वाद

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रांची: हेमंत सोरेन के सामने एक बार फिर परिवार की चुनौती सामने आ खड़ी हुई है। खबरों के मुताबिक हेमंत सोरेन के बड़े भाई दुर्गा सोरेन की बेटी जयश्री सोरेन ने जामा सीट पर दावेदारी ठोक दी है।
इस सीट से जेएमएम की ओर से लुईस मरांडी को टिकट भी दे दिया गया है। लेकिन जयश्री सोरेन के शिबू सोरेन से मिलने के बाद कहा जा रहा है कि जयश्री सोरेन ने अपना दादा से आशीर्वाद में जामा सीट मांग ली है।
हेमंत सोरेन की बढ़ी मुश्किलें
जयश्री सोरेन बुधवार को अपने दादा शिबू सोरेन से मिली थीं। माना जा रहा है कि जयश्री सोरेन अपने पिता की सीट चाहती हैं। सीता सोरेन अपनी बेटी के लिए बीजेपी से जामा सीट चाहती थीं। लेकिन बीजेपी ने जयश्री को टिकट नहीं दिया है। हालांकि जेएमएम की ओर से जामा से लुईस मरांडी का चुनाव लड़ना तय है। इसी बीच जयश्री सोरेन ने शिबू सोरेन से मुलाकात की है। लुईस मरांडी बीते दिनों ही बीजेपी में शामिल हुई हैं।
भाजपा ने दुर्गा सोरेन की पत्नी और शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन को जामताड़ा सामान्य सीट से उम्मीदवार बनाया है। झारखंड में नियम है कि किसी दूसरे स्टेट की महिला राज्य में आरक्षण का लाभ नहीं उठा सकती है। इसलिए कल्पना सोरेन भी गांडेय सामान्य सीट से चुनाव लड़कर विधायक बनीं और एक बार फिर से गांडेय से चुनाव लड़ रही हैं। सीता और कल्पना दोनों ओडिशा की रहने वाली हैं।
हेमंत सोरेन कैसे फंसे?
जयश्री सोरेन की मुलाकात के बाद शिबू सोरेन अगर अपनी नातिन के पक्ष में खड़े हो जाते हैं तो हेमंत सोरेन के लिए मुश्किलें बढ़ जाएगी। लुईस मरांडी झारखंड की बड़ी नेता हैं और वह हेमंत सोरेन को भी चुनाव हरा चुकी हैं। इससे पता चलता है कि लुईस मरांडी का जेएमएम के लिए क्या महत्व है। लुईस ने 2014 के चुनाव में दुमका सीट से हेमंत सोरेन को हराया था। बीजेपी ने लुईस को दुमका की बजाय बरहेट से चुनाव लड़ने को कहा था, लेकिन लुईस ने साफ मना कर दिया और जेएमएम में शामिल हो गईं। लुईस के साथ होने से संथाल परगना में जेएमएम को आदिवासी वोटों को एकजुट रखने में मदद मिलेगी और इसका कई सीटों पर फायदा देखने को मिलेगा।
देखना ये होगा कि हेमंत सोरेन अपनी भतीजी और पिता को कैसे मनाते हैं। जयश्री को खाली हाथ लौटाना हेमंत सोरेन के लिए मुश्किल होगा, लेकिन सियासी तौर पर लुईस मरांडी को मना करना भी आसान नहीं है।

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