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क्या जनप्रतिनिधियों को अपनी भाषा और सार्वजनिक बयानों की मर्यादा का ध्यान नहीं रखना चाहिए ???
लोकतंत्र में राजनीतिक विचारधारा अलग-अलग हो सकती है। कोई पार्टी छोटी हो या बड़ी, सत्ता में हो या विपक्ष में, उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों का सम्मान भी लोकतांत्रिक मर्यादा का हिस्सा है।
किसी सांसद द्वारा JLKM पार्टी के सदस्यों को कथित तौर पर ‘कुत्ता’ कहना राजनीतिक बहस में भाषा और शालीनता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सांसद का पद केवल राजनीतिक ताकत का प्रतीक नहीं, बल्कि जनता के प्रति जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। असहमति है तो तथ्यों और तर्कों से जवाब दिया जाना चाहिए, न कि अपमानजनक शब्दों से।
लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार सबको है, लेकिन किसी को अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं मिल जाता।
चाहे JLKM हो, भाजपा हो, कांग्रेस हो, झामुमो हो या कोई अन्य राजनीतिक दल, हर दल के कार्यकर्ताओं की अपनी गरिमा है।
राजनीति में विरोध विचारों का होना चाहिए, व्यक्तियों के सम्मान का नहीं।